इस सभा की स्थापना का कोईऐसा उद्देश्य नही जो हमारी क्षमता से परे हो ;मुख्यतः एक ऐसे समाज की रचना करनी है जिसकी धारणा "वसुधैव कुटुम्बकम" है अर्थात प्रत्येक प्राणी मात्र में समरसता और सद्भावना की स्थापना है ;आज के बदलते परिवेश में नित नई कल्पनाये जन्म ले रही है और समाज भौतिकता के अंधे मार्ग पे अविरल गतिमान है जिससे अंततः इसका निष्कर्ष विनाश की ओर ले जाएगा ;ब्राह्मण सदैव से सनातन धर्म की ध्वजा का मूल वाहक रहा है और आज फिर से इस जिम्मेदारी को गंभीर रूप से वहन करना उसका नैतिक और सामाजिक कर्तव्य हो चूका है इसलिए इस सभा की स्थापना नितांत आवश्यक थी जिसके द्वारा विश्व के सभी ब्राह्मण एक मंच के नीचे एकत्र होकर पुनः धर्म का शंखनाद कर सके क्युकी ब्राह्मण धर्म भी यही कहता है !!!
सामाजिक न्याय के नाम पर सामाजिक समरसता की जिस प्रकार अनदेखी की गयी उससे समाज में ब्राह्मण का अस्तित्व भी खतरे में दिखता हैं। शायद इसी कारण श्री रामकृष्ण हेगडे ने "ब्राह्मणों को भी अल्प संख्यक" कहा था (साप्ताहिक हिन्दुस्तान, जनवरी ११, १९८७)। स्वामी विवेकानंद ने भी आदर्श राष्ट्र की परिकल्पना करते हुए कहा था कि आदर्श राष्ट्र के लिए पुरोहित का ज्ञान, योद्धा की संस्कृति, व्यापारिक वितरणशीलता और अंतिम वर्ण को समता अत्यन्त अवश्यक हैं। इसके लिए सभी वर्णों को अपने पूर्वाग्रहों का परित्याग करके एक राष्ट्र की कामना से एक दुसरे का आलिंगन करना होगा!!
सामाजिक न्याय के नाम पर सामाजिक समरसता की जिस प्रकार अनदेखी की गयी उससे समाज में ब्राह्मण का अस्तित्व भी खतरे में दिखता हैं। शायद इसी कारण श्री रामकृष्ण हेगडे ने "ब्राह्मणों को भी अल्प संख्यक" कहा था (साप्ताहिक हिन्दुस्तान, जनवरी ११, १९८७)। स्वामी विवेकानंद ने भी आदर्श राष्ट्र की परिकल्पना करते हुए कहा था कि आदर्श राष्ट्र के लिए पुरोहित का ज्ञान, योद्धा की संस्कृति, व्यापारिक वितरणशीलता और अंतिम वर्ण को समता अत्यन्त अवश्यक हैं। इसके लिए सभी वर्णों को अपने पूर्वाग्रहों का परित्याग करके एक राष्ट्र की कामना से एक दुसरे का आलिंगन करना होगा!!
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