"ब्राहमण समाज "
ब्राहमण समाज
कल मेरे एक ज्येष्ठ भ्राता ने, कहा लिखो तुम कविता,
जिसमे हो ब्राहमण समाज, जिसमे हो पूर्ण पवित्रता,
चलो शुरू करते है कविता की रचना, आप जिसे समझे वास्तव में वाही तो है अपना,
राम कृष्ण की धरती पर कितने समाज है बने हुए,
कितने अल्लाह कितने जीसस है यहाँ हुए,
पर ध्यान से देखा जाय तो है हम एक ईश के बेटे,
ये पृथ्वी भी तो हर जन को है एक सूत्र में समेटे,
पृथ्वी तो भी है एक समाज, जो इतने लोगो को है समा लिया
हमने भी तो है एक समाज, को फसबूक पर बना लिया,
प्राचीन काल से ब्राह्मन सबका अस्तित्व आया है बचाता
कल मेरे एक ज्येष्ठ भ्राता ने, कहा लिखो तुम कविता,
जिसमे हो ब्राहमण समाज, जिसमे हो पूर्ण पवित्रता,...............
कर्मो के आधार पर हमने, सबको अलग अलग है बांटा,
ब्राह्मन, क्षत्रिय, वैश्य और सूद्र, इन सबका है एक ही दाता,
इस्वर ने भी ब्राह्मन को समझा है जनश्रेष्ठ की श्रेणी में,
आप भी समझे आप भी जाने, उसके इस महान जीवन को,
सही शिक्षा तो वही है देता, तो क्यों चाहें और किसी को,
भगवन तक पहुचाने का मार्ग उसी ने दिखलाया,
तो फिर क्यों तुम दूर जा रहे, छोड़ के इस ब्राह्मन समाज को ,
जय श्रीराम, हो या जय श्रीकृष्णा, ली शिक्षा और दिए उपदेश,
वो भी तो भगवान ही थे ना, जिनका स्वयं तो ब्राह्मन भी था और था ये उनका ही तो देश,
वे देना चाहते थे सन्देश इन जन जन और जीवन को,
की कैसे बचाया ब्राह्मन ने इस अखिल विश्व और मानवता को,
दुनिया के इस मनुष्य मात्र को, वही तो असली जन्म दिलाता,
कल मेरे एक ज्येष्ठ भ्राता ने, कहा लिखो तुम कविता,
जिसमे हो ब्राहमण समाज, जिसमे हो पूर्ण पवित्रता,...............
भगवन जी की परीक्षा को, हनुमत जी ही बने थे ब्राह्मन,
अंतर मन से जान लिया, इस बन में है कौन ये ब्राह्मन,
और मै क्या क्या सुनाऊ समाज को, कितनी महत्ता है इस जाति की,
जो सब पापो से मुक्त कराता, वही तो भगवन के दर्शन कराता,
चलो साथ हम एक एक करके, इस समाज को यह बतलाये,
श्रेष्ठ तो वैसे सभी समाज है,, ब्राह्मन समाज अति श्रेष्ठ कहलाये,
बोलो हम सब एक ही स्वर में, एक हमारा है उद्देश्य,
नहीं कोई है दूर ओ बंधू, अब बन गयी है समाज की एक साईट,
चाहे हो अब देश हमारा, या हो पूरा विश्व विदेश,
गर तुमको हो कोई समस्या, या हो कोई अलग कहानी,
आ जाओ तुम ब्राह्मन बंधू , मिलेगी तुमको यहाँ से गाइड,
कोई तुम्हारे दिल की इच्छा, अब तो रह गयी हो बाकी,
ठीक मेरी तरह भी तुम अपना, कविता या कहानी और या सबद या साखी,
हा, एक बात मेरी तुम ध्यान रखो की, प्रयोग हो मर्यादित भाषा,
येही रहेगी तुम सबसे और यही रहेगी हर लोगो से,
और यही साईट की है अभिलाषा,
धन्य हुआ मै मै कविता लिखकर, नहीं तो बस मै हु एक जड़ता,
श्रेष्ठ जनों काशिष है मुझपर, जो लिख पाता हु ये सब कविता,
कल मेरे एक ज्येष्ठ भ्राता ने, कहा लिखो तुम कविता,
जिसमे हो ब्राहमण समाज, जिसमे हो पूर्ण पवित्रता,...............
धन्यवाद
मित्रो और फस्बूक समूह जन
क्षमा : यदि इस कविता की पक्ति में कोई भी त्रुटी पूर्ण वाक्य या कोई वाक्य अधुरा हो तो मै सहृदय क्षमा प्रार्थ हु, और आपके सुझाव सादर निवेदन है !


(रचना : संजय पाण्डेय )
बहुत ही श्रेष्ठ रचना है ;आशा है की ऐसी रचनाओं से आगे भी हम सब तृप्त होंगे
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